मय्यत का ग़ुस्ल
नमाज़-ए-जनाज़ा और दफ़न से पहले शरई पवित्रता। समुदाय पर फ़र्ज़, फ़र्ज़-ए-किफ़ाया।
मय्यत का ग़ुस्ल मय्यत को नमाज़-ए-जनाज़ा और दफ़न के लिए तैयार करता है। फ़र्ज़-ए-किफ़ाया का अर्थ है: इसका होना ज़रूरी है, पर हर व्यक्ति का ख़ुद करना ज़रूरी नहीं।
ग़ुस्ल कौन देता है
महिलाओं को महिलाएँ और पुरुषों को पुरुष ग़ुस्ल देते हैं। पति-पत्नी एक-दूसरे को ग़ुस्ल दे सकते हैं। ग़ुस्ल देने वाले को अहकाम का ज्ञान और अनुभव होना चाहिए।
हमारे यहाँ यह काम वह व्यक्ति करता है जो अहकाम जानता है और वर्षों से यह सेवा कर रहा है। अगर आप किसी जानकार को साथ लाना चाहें, तो यह संभव है। परिजन देख सकते हैं, पर ज़रूरी नहीं।
कदम दर कदम
मय्यत का ग़ुस्ल सम्मान के साथ और मय्यत की गरिमा का ध्यान रखते हुए दिया जाता है। पूरे ग़ुस्ल के दौरान सतर ढका रहने का ध्यान रखा जाता है।
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तैयारी
मय्यत को ग़ुस्ल के लिए तैयार करके ग़ुस्ल के तख़्ते पर रखा जाता है। पानी, दस्ताने, तौलिये, बेरी के पत्ते और कपूर जैसी ज़रूरी चीज़ें तैयार रखी जाती हैं।
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शरीर की सफ़ाई
पहले मौजूद नापाकी सावधानी से दूर की जाती है और संबंधित हिस्से अच्छी तरह साफ़ किए जाते हैं। सतर ढका रहता है और उसे नंगे हाथ से नहीं छुआ जाता।
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वुज़ू
फिर वुज़ू के अंग धोए जाते हैं। सावधानी बरती जाती है कि पानी बेवजह मुँह या नाक में न जाए।
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सिर और बाल धोना
सिर और बाल सावधानी से धोकर साफ़ किए जाते हैं। मय्यत महिला हो तो सफ़ाई के बाद बालों की तीन चोटियाँ बनाई जाती हैं।
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दाईं ओर धोना
पूरे शरीर का ग़ुस्ल दाईं ओर से शुरू होता है। शरीर को ऊपर से नीचे सावधानी से धोया जाता है।
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बाईं ओर धोना
फिर बाईं ओर उसी तरह धोई जाती है।
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पीठ धोना
मय्यत को सावधानी से करवट दी जाती है ताकि पीठ और पिछले हिस्से भी पूरी तरह साफ़ हो सकें। फिर शरीर को धीरे से पहली स्थिति में लाया जाता है।
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और ग़ुस्ल
सफ़ाई की ज़रूरत के अनुसार ग़ुस्ल दोहराया जाता है। आमतौर पर विषम संख्या में, जैसे तीन, पाँच या सात बार।
सफ़ाई के लिए बेरी के पत्तों वाला पानी इस्तेमाल किया जा सकता है।
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अंतिम ग़ुस्ल
अंतिम ग़ुस्ल में पानी में कपूर मिलाया जाता है। पूरा शरीर एक बार फिर सावधानी से धोया जाता है।
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सुखाना और कफ़न की तैयारी
ग़ुस्ल पूरा होने के बाद शरीर को सावधानी से सुखाया जाता है। इस दौरान भी मय्यत की गरिमा और पर्दे का ध्यान रखा जाता है।
इसके बाद मय्यत कफ़न पहनाने के लिए तैयार है।
अगर ग़ुस्ल संभव न हो
गंभीर चोटों में या जब ग़ुस्ल संभव न हो, उसकी जगह तयम्मुम किया जाता है। अगर ऐसा हो तो हम आपको साफ़-साफ़ बता देते हैं।